नव वर्ष की सभी मित्रों को बधाई.....
Friday, 5 January 2018
Tuesday, 12 September 2017
मीना लोक साहित्य- विजय सिंह मीना
मीणा लोकगाथा गीत एवम लोकगीतों का शैलीगत परिचय
- हरी कीर्तन -
इसे स्थानीय भाषा में कीर्तन,धुन,रामधूणी आदि नामों से भी अभिहित किया जाता है । यह प्रबंधपरक लोकगीत है जिसकी कथावस्तु किसी प्रसिद्ध पौराणिक आख्यान या रामायण और महाभारत के प्रसिद्ध कथानकों से ली जाती है । इसके गठन में दौहा, चौपाई,सिरबंदा,कड़ी, बढ़ावा आदि मुख्य अंग होते है । इसके स्वर ऊंचे और तेज आवाज में गाये जाते हैं । इसके गाने वालो की संख्या 25 से 50 तक होती है, जो दो भागों में विभाजित रहते हैं ।8-10 व्यक्ति खड़े होकर गाते है बाकी नीचे समूह रुप में बैठकर गाते हैं । इनके गाने वालों के समूह को जोठ या मंडली कहा जाता हे । एक व्यक्ति सारी जोठ का मुखिया या मुख्य गायक के रुप में होता है जिसे मेडिया कहा जाता है । इसमें मुख्य रुप से ढोलक,हारमोनियम, तासी, चिमटा, झांझ-मजीरा,भपंगा आदि मुख्य वाद्य यंत्र होते हैं । मीणा-समाज में गांवों में लोग इन जोठों को आमंत्रित कर एक स्थान पर इनका प्रदर्शन व गायन सुनते हैं जिसे दंगल कहा जाता है । इनके गायन का प्रवाह, लय,तुकबंदी और ऊंचा सुर ही इसकी प्रसिद्धि के मुख्य अवयव है । इसमें सर्वप्रथम ईश वंदना होती है जिसे स्थानीय भाषा में भवानी मनाना कहते हैं। इसमें मुख्य रुप से गणेश, सरस्वती,दुर्गा अथवा अंचल की कोई लोक देवी या देवता का स्मरण किया जाता है, जिसमें गायक की यही मनोकामना रहती है कि हे आराध्य इस सभा या दंगल में हमारी जोठ ही विजयी होवे।
दोहा सुर बिन मिले ना सरस्वती, गुरू बिन मिले ना ज्ञान
कंठ बैठ परमेश्वरी, मैं धरु तुम्हारो ध्यान ।
मुखड़ा गणपति प्यारे, शिवजी के राजदुलारे ,
मनाऊं तोने आज रे
मेरी लज्जा तुम्हारे हाथ रे ।
हे गण नायक गणेश, हे शिवजी के प्यारे सुपुत्र आज इस सभा में सर्वप्रथम मैं तुम्हारा ही आव्हान कर रहा हूं क्योंकि अब मेरी प्रतिष्ठा को बचाने वाला तुम्हारे अलावा कोई नहीं है ।
दर्शकगण प्रत्येक मंडली की ईश वंदना से ही उनके गायन और उसकी जीतने की संभावनाओं का अंदाजा लगाना शुरू कर देते तथा यहां एक मान्यता बलवती है कि प्रारम्भ यदि अच्छा हो तो विजय की संभावना काफी बलवती हो जाती है । इसीलिए सभी कीर्तन मंडलिया ईश वंदना की प्रस्तुति अपने अपने अनूठे अंदाज में करने की कोशिश करती हैं ।
इसके पश्चात् विभिन्न धार्मिक कथाओं पर आधारित हरि कीर्तनों की प्रस्तुति मनमोहक धुनों और आर्कषक सुर-ताल और उत्कृष्ट तुकबंदी में प्रारम्भ होती है जो अनायास ही दर्शकों को भाव विभोर कर देती हैं । चर्चित कथाओं में नरसी जी का भात, शिव-विवाह, रावर्ण-अंगद संवाद, बलि राजा का जन्म, कृष्ण की माखन चोरी और उससे जुड़ी विभिन्न अर्न्तकथाएं, लंका दहन, पारासर ऋषि,अहिल्या उद्धार, मछोदरी की कथा, शिवजी की अमर कथा आदि की प्रस्तुति देखने लायक होती हैं । इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्राचीन कथाओं को इन्होंने आधुनिक परिवेश के अनुरुप ढ़ालकर उसमें आकर्षण के नवीन आयाम पैदा किये जैसे तुलसीदास जी जब कामांध होकर रात्रि में ही अपनी ससुराल में रत्नावली के पास पहुंच जाते हैं । रत्नावली उन्हें विभिन्न प्रकार के उपालम्य देती हुई कहती है कि -
अब आयो जो बीच बलम तड़के दिन दिन सू आतो,
होता जंवाई गाड़ी गीत चोखा तू माल खातो,
हे रे होती आवादानी, खिंदाबा में नहीं करे आनी
कछु तू बौसातो, अरे हो पिछोड़ी निश्चय ले जातो |
मीणा लोकगाथा गीत एवम लोकगीतों का शैलीगत परिचय
- हरी कीर्तन -
इसे स्थानीय भाषा में कीर्तन,धुन,रामधूणी आदि नामों से भी अभिहित किया जाता है । यह प्रबंधपरक लोकगीत है जिसकी कथावस्तु किसी प्रसिद्ध पौराणिक आख्यान या रामायण और महाभारत के प्रसिद्ध कथानकों से ली जाती है । इसके गठन में दौहा, चौपाई,सिरबंदा,कड़ी, बढ़ावा आदि मुख्य अंग होते है । इसके स्वर ऊंचे और तेज आवाज में गाये जाते हैं । इसके गाने वालो की संख्या 25 से 50 तक होती है, जो दो भागों में विभाजित रहते हैं ।8-10 व्यक्ति खड़े होकर गाते है बाकी नीचे समूह रुप में बैठकर गाते हैं । इनके गाने वालों के समूह को जोठ या मंडली कहा जाता हे । एक व्यक्ति सारी जोठ का मुखिया या मुख्य गायक के रुप में होता है जिसे मेडिया कहा जाता है । इसमें मुख्य रुप से ढोलक,हारमोनियम, तासी, चिमटा, झांझ-मजीरा,भपंगा आदि मुख्य वाद्य यंत्र होते हैं । मीणा-समाज में गांवों में लोग इन जोठों को आमंत्रित कर एक स्थान पर इनका प्रदर्शन व गायन सुनते हैं जिसे दंगल कहा जाता है । इनके गायन का प्रवाह, लय,तुकबंदी और ऊंचा सुर ही इसकी प्रसिद्धि के मुख्य अवयव है । इसमें सर्वप्रथम ईश वंदना होती है जिसे स्थानीय भाषा में भवानी मनाना कहते हैं। इसमें मुख्य रुप से गणेश, सरस्वती,दुर्गा अथवा अंचल की कोई लोक देवी या देवता का स्मरण किया जाता है, जिसमें गायक की यही मनोकामना रहती है कि हे आराध्य इस सभा या दंगल में हमारी जोठ ही विजयी होवे।
दोहा सुर बिन मिले ना सरस्वती, गुरू बिन मिले ना ज्ञान
कंठ बैठ परमेश्वरी, मैं धरु तुम्हारो ध्यान ।
मुखड़ा गणपति प्यारे, शिवजी के राजदुलारे ,
मनाऊं तोने आज रे
मेरी लज्जा तुम्हारे हाथ रे ।
हे गण नायक गणेश, हे शिवजी के प्यारे सुपुत्र आज इस सभा में सर्वप्रथम मैं तुम्हारा ही आव्हान कर रहा हूं क्योंकि अब मेरी प्रतिष्ठा को बचाने वाला तुम्हारे अलावा कोई नहीं है ।
दर्शकगण प्रत्येक मंडली की ईश वंदना से ही उनके गायन और उसकी जीतने की संभावनाओं का अंदाजा लगाना शुरू कर देते तथा यहां एक मान्यता बलवती है कि प्रारम्भ यदि अच्छा हो तो विजय की संभावना काफी बलवती हो जाती है । इसीलिए सभी कीर्तन मंडलिया ईश वंदना की प्रस्तुति अपने अपने अनूठे अंदाज में करने की कोशिश करती हैं ।
इसके पश्चात् विभिन्न धार्मिक कथाओं पर आधारित हरि कीर्तनों की प्रस्तुति मनमोहक धुनों और आर्कषक सुर-ताल और उत्कृष्ट तुकबंदी में प्रारम्भ होती है जो अनायास ही दर्शकों को भाव विभोर कर देती हैं । चर्चित कथाओं में नरसी जी का भात, शिव-विवाह, रावर्ण-अंगद संवाद, बलि राजा का जन्म, कृष्ण की माखन चोरी और उससे जुड़ी विभिन्न अर्न्तकथाएं, लंका दहन, पारासर ऋषि,अहिल्या उद्धार, मछोदरी की कथा, शिवजी की अमर कथा आदि की प्रस्तुति देखने लायक होती हैं । इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्राचीन कथाओं को इन्होंने आधुनिक परिवेश के अनुरुप ढ़ालकर उसमें आकर्षण के नवीन आयाम पैदा किये जैसे तुलसीदास जी जब कामांध होकर रात्रि में ही अपनी ससुराल में रत्नावली के पास पहुंच जाते हैं । रत्नावली उन्हें विभिन्न प्रकार के उपालम्य देती हुई कहती है कि -
अब आयो जो बीच बलम तड़के दिन दिन सू आतो,
होता जंवाई गाड़ी गीत चोखा तू माल खातो,
हे रे होती आवादानी, खिंदाबा में नहीं करे आनी
कछु तू बौसातो, अरे हो पिछोड़ी निश्चय ले जातो |
हे प्राणनाथ तू इस घनघोर रात्रि के स्थान पर यदि कल दिन में यहां आता तो तेरा यहां मान-सम्मान होता । तेरी साली-सलहज तेरे आने की खुशी में गीत-गाली गाती तथा तेरे लिए अच्छे अच्छे पकवान बनाती । मेरे माता-पिता भी खुशी-खुशी तेरे साथ विदा कर देते साथ् ही तुझे विदा में निश्चित तौर पर उत्तरीय वस्त्र(पिछोड़ी) भी देते । हे प्राणनाथ क्या तुम्हारे मन ने इन बातों का पूर्वानुमान लगाना बिल्कुल ही बंद कर दिया है।
सिया के टप टप टपके नीर,
माता मनमें बांधो धीर,
बोले पवन पुत्र बलबीर, समझा रहयो है,
झठ प्रक्ट भये हनुमान, सिया के चरणन सीस
नवायो है , वाकू समझ राम को दूत,
सिया ने ऐसे वचन सुनायो रै,
श्री रघुवर कृपा निकेता,
है कुशल अनुज समेता ।।
हनुमान जी जब अशोक वाटिका में मुद्रिका को सीता के समक्ष गिराते है तो सीता उसे देखकर चिंतित हो रोने लगती है,तब हनुमान जी वहां प्रकट होकर सीता को राम व लक्ष्मण की कुशलता से अवगत कराते है । उसी कारुंणिक दृश्य को यहां इस लोकगीत की पंक्ति में बड़े ही सुन्दर ढंग से चित्रित किया गया है । इस पद्य में खड़ी बोली, ब्रज और लोक बोली का सामंजस्य बड़ा ही सटीक ढंग से बिठाया गया है, जिससे पद की गेयता में प्रवाह को अत्यधिक बल मिला है ।
उठै दरद हो ज्याय कूंकड़ो बैठयो बैठयो रोवे,
बैठ बगल राणी कै पूछे कितना दिन में होवे,
मैं तो बैठयो हूं लाचार,
कर दे दाई कू समचार,
फेर रिस आय, ठीकरी खाय, खटाई मंगवाय,
रोज राणी सू ।
रात चौगुणो दिन में दूणो, पडयो फरक पाणी सू,
पाणी पियो रात में सारो
हो तो जावे पेट नंगारो
भारी होगा दोनूं पांव
सुपना बुरा बुरा सा आंय
भारी होय, रात में रोय, कतई नहीं सोय, भूप घीगायो,
धीरज राखो स्वामी नौ महिना को होतो आयो,
कर विचार मन में अपार,
समझा रही जणी जणी
ओ जीजी याको रामजी धणी ।।
ये गीत बलिराजा के जन्म की कथा से उदधृत है । जब राजा बहलोजन मंत्रो से मथे हुए पानी को रानी को पिलाने के स्थान पर भूलवश स्वयं पी जाते है |उनके गुरु शुक्राचार्य ने कहा था कि इस पानी को अपनी रानी को पिला देना वह गर्भवती हो जाएगी और तुम्हें एक पुत्ररत्न की प्राप्ति होगी । भूलवश राजा जब उस पानी को पी जाता है तो उसके प्रभाव से राजा के पेट में बच्चा पलने लगता है । इसी प्रसव-पूर्व वेदना का वर्णन यहां प्रश्नोत्तर शैली में आधुनिक भावचित्रों एवं प्रसव पूर्ण की वेदना अनुभूतियों के साथ बड़े ही हास्यस्पद ढ़ंग से प्रस्तुत किया गया है ।
भावार्थ - राजा का चेहरा प्रसव वेदना से मलीन और व्यथित हो रहा है । राजा बड़े ही उत्सुक और चिन्तातुर भाव से अपनी पटरानी से पूछता है कि - हे महारानी मेरे उदर में इतना तेज दर्द होता है कि मैं ढंग से बैठ भी नहीं पाता हूं, मुझे ये तो बता कि बच्चा कितने दिन में होता है । मैं तो सभी प्रकार से लाचार होकर घर में कैद सा हो रहा हूं । ना तो राजदरबार और ना ही महल से कहीं बाहर जा सकता हूं । राजा खीजकर कभी ठीकरे खाने लगता है तो कभी खटाई खाने की इच्छा प्रकट करता है । आर्तभाव से पश्चातापवश सोचता है कि मैंने जिस दिन से मंत्र-मथित जल पिया है उसी दिन से यह बालक दिन दूना और रात चौगुना मेरे उदर में बढ रहा है। मेरी उदराकृति एक नंगाड़े की भांति दिखाई देने लग गई । दौनों पैरों में भारीपन आ गया तथा रात्रि को बुरे बुरे स्वपन आते है । इस प्रकार के वचनों को सुन रानी उन्हें धैर्य धारण करने की विनती करती हैं । अन्त:पुर की अन्य दासियॉं आपस में विचार करती हुई कह रही है कि अब तो इसका ईश्वर ही मालिक है। इस गीत में प्रसव-पूर्व होने वाली कठिनाईयों, मन का विचलन, खट्टी -मीठी वस्तुओं को खाने की इच्छा का बड़ा ही सजीव चित्र खींचा है और साथ् उत्कृष्ट तुकबंदी ने इसमें चार चांद लगा दिये हैं ।
सौंठ सुपारी और छुवारा पिस्ता किसमिस न्याड़ी,
दाखन सू थैलो भर दियो पांच किलो ली झाडी,
कनस्तर लियो देशी घी को बूरो स्यामा हलवाई को,
बता रही बात, और का चाहत, लिस्ट है हाथ,
तेल तेली को ।
बणियां का सू बोली भाया गुड़ दीज्यो भेली को,
भेली हाथा-हूत घिताई, आगे सारी लिस्ट बताई,
लीयो मूंग उड़द को चूरो, और सामान बांध लियो पूरो,
कुर्ता टोपी कई जोड़ी, चावल हड़दी रोड़ी मोड़ी,
उठा लियो झट्ट, बैठ गई रट्ट, धरयो है फट्ट,
माल को थैलो,
गाड़ी में धर दीयो वाने लियो गांव को गेलो
कर विचार मन में अपार, बतड़ा रही जणी जणी,
हो राजा आगो अणी-तणी ।।
सिया के टप टप टपके नीर,
माता मनमें बांधो धीर,
बोले पवन पुत्र बलबीर, समझा रहयो है,
झठ प्रक्ट भये हनुमान, सिया के चरणन सीस
नवायो है , वाकू समझ राम को दूत,
सिया ने ऐसे वचन सुनायो रै,
श्री रघुवर कृपा निकेता,
है कुशल अनुज समेता ।।
हनुमान जी जब अशोक वाटिका में मुद्रिका को सीता के समक्ष गिराते है तो सीता उसे देखकर चिंतित हो रोने लगती है,तब हनुमान जी वहां प्रकट होकर सीता को राम व लक्ष्मण की कुशलता से अवगत कराते है । उसी कारुंणिक दृश्य को यहां इस लोकगीत की पंक्ति में बड़े ही सुन्दर ढंग से चित्रित किया गया है । इस पद्य में खड़ी बोली, ब्रज और लोक बोली का सामंजस्य बड़ा ही सटीक ढंग से बिठाया गया है, जिससे पद की गेयता में प्रवाह को अत्यधिक बल मिला है ।
उठै दरद हो ज्याय कूंकड़ो बैठयो बैठयो रोवे,
बैठ बगल राणी कै पूछे कितना दिन में होवे,
मैं तो बैठयो हूं लाचार,
कर दे दाई कू समचार,
फेर रिस आय, ठीकरी खाय, खटाई मंगवाय,
रोज राणी सू ।
रात चौगुणो दिन में दूणो, पडयो फरक पाणी सू,
पाणी पियो रात में सारो
हो तो जावे पेट नंगारो
भारी होगा दोनूं पांव
सुपना बुरा बुरा सा आंय
भारी होय, रात में रोय, कतई नहीं सोय, भूप घीगायो,
धीरज राखो स्वामी नौ महिना को होतो आयो,
कर विचार मन में अपार,
समझा रही जणी जणी
ओ जीजी याको रामजी धणी ।।
ये गीत बलिराजा के जन्म की कथा से उदधृत है । जब राजा बहलोजन मंत्रो से मथे हुए पानी को रानी को पिलाने के स्थान पर भूलवश स्वयं पी जाते है |उनके गुरु शुक्राचार्य ने कहा था कि इस पानी को अपनी रानी को पिला देना वह गर्भवती हो जाएगी और तुम्हें एक पुत्ररत्न की प्राप्ति होगी । भूलवश राजा जब उस पानी को पी जाता है तो उसके प्रभाव से राजा के पेट में बच्चा पलने लगता है । इसी प्रसव-पूर्व वेदना का वर्णन यहां प्रश्नोत्तर शैली में आधुनिक भावचित्रों एवं प्रसव पूर्ण की वेदना अनुभूतियों के साथ बड़े ही हास्यस्पद ढ़ंग से प्रस्तुत किया गया है ।
भावार्थ - राजा का चेहरा प्रसव वेदना से मलीन और व्यथित हो रहा है । राजा बड़े ही उत्सुक और चिन्तातुर भाव से अपनी पटरानी से पूछता है कि - हे महारानी मेरे उदर में इतना तेज दर्द होता है कि मैं ढंग से बैठ भी नहीं पाता हूं, मुझे ये तो बता कि बच्चा कितने दिन में होता है । मैं तो सभी प्रकार से लाचार होकर घर में कैद सा हो रहा हूं । ना तो राजदरबार और ना ही महल से कहीं बाहर जा सकता हूं । राजा खीजकर कभी ठीकरे खाने लगता है तो कभी खटाई खाने की इच्छा प्रकट करता है । आर्तभाव से पश्चातापवश सोचता है कि मैंने जिस दिन से मंत्र-मथित जल पिया है उसी दिन से यह बालक दिन दूना और रात चौगुना मेरे उदर में बढ रहा है। मेरी उदराकृति एक नंगाड़े की भांति दिखाई देने लग गई । दौनों पैरों में भारीपन आ गया तथा रात्रि को बुरे बुरे स्वपन आते है । इस प्रकार के वचनों को सुन रानी उन्हें धैर्य धारण करने की विनती करती हैं । अन्त:पुर की अन्य दासियॉं आपस में विचार करती हुई कह रही है कि अब तो इसका ईश्वर ही मालिक है। इस गीत में प्रसव-पूर्व होने वाली कठिनाईयों, मन का विचलन, खट्टी -मीठी वस्तुओं को खाने की इच्छा का बड़ा ही सजीव चित्र खींचा है और साथ् उत्कृष्ट तुकबंदी ने इसमें चार चांद लगा दिये हैं ।
सौंठ सुपारी और छुवारा पिस्ता किसमिस न्याड़ी,
दाखन सू थैलो भर दियो पांच किलो ली झाडी,
कनस्तर लियो देशी घी को बूरो स्यामा हलवाई को,
बता रही बात, और का चाहत, लिस्ट है हाथ,
तेल तेली को ।
बणियां का सू बोली भाया गुड़ दीज्यो भेली को,
भेली हाथा-हूत घिताई, आगे सारी लिस्ट बताई,
लीयो मूंग उड़द को चूरो, और सामान बांध लियो पूरो,
कुर्ता टोपी कई जोड़ी, चावल हड़दी रोड़ी मोड़ी,
उठा लियो झट्ट, बैठ गई रट्ट, धरयो है फट्ट,
माल को थैलो,
गाड़ी में धर दीयो वाने लियो गांव को गेलो
कर विचार मन में अपार, बतड़ा रही जणी जणी,
हो राजा आगो अणी-तणी ।।
जब रानी को निश्चय हो गया कि अब दो-चार दिन में ही राजा के जापा होने वाला हें तो उसने प्रसव के बाद दिये जाने वाले सामान की सूची बनाकर उसे बाजार से खरीद रही हैं । इस गीत में उसी सामान का वर्णन किया गया है ।
इस गीत की विशेषता यह है कि इसमें मीणा संस्कृति को पूरी तरह साकार किया गया हे । मीणाओं में प्रसव के बाद जो सामान जच्चा को दिया जाता है उसका यहां परिगणन शैली में बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया गया हैं । प्राचीन कथा का आधुनिकीकरण कर उसे मीणा संस्कृति के अनुरुप प्रस्तुतीकरण ही इस विधा का मुख्य वैशिष्ट्य है ।
सौमोती रामोती भौती फाबूली और जगनी,
धनकोरी धनमंती धन्नो धापा संग में मगनी,
कमला भारी बणै खिलार, बिमला बैठी है शरमार,
बुलाओ देर,
धूगरी लेर,
करी नहीं देर,
पहुंचगी जल्लो।
केसंती कंपूरी कैला आगे मिलगी कल्लो ।
सुगनी लाडो बाडो भौंरी रेसी रामा रामकटोरी,
केसो रामकली केसंती पीछे केसर ओर उगंती,
उठायो गीत,
बगल में भीत
अनोखी रीत
घूगरी सीजी
खील पतासा बांट रही है रामचरण की जीजी
हे रे गीत गार, निकली है भार, चलदी है जब घरकू ।
जामणो तेरस कू ।।
इस गीत की विशेषता यह है कि इसमें मीणा संस्कृति को पूरी तरह साकार किया गया हे । मीणाओं में प्रसव के बाद जो सामान जच्चा को दिया जाता है उसका यहां परिगणन शैली में बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया गया हैं । प्राचीन कथा का आधुनिकीकरण कर उसे मीणा संस्कृति के अनुरुप प्रस्तुतीकरण ही इस विधा का मुख्य वैशिष्ट्य है ।
सौमोती रामोती भौती फाबूली और जगनी,
धनकोरी धनमंती धन्नो धापा संग में मगनी,
कमला भारी बणै खिलार, बिमला बैठी है शरमार,
बुलाओ देर,
धूगरी लेर,
करी नहीं देर,
पहुंचगी जल्लो।
केसंती कंपूरी कैला आगे मिलगी कल्लो ।
सुगनी लाडो बाडो भौंरी रेसी रामा रामकटोरी,
केसो रामकली केसंती पीछे केसर ओर उगंती,
उठायो गीत,
बगल में भीत
अनोखी रीत
घूगरी सीजी
खील पतासा बांट रही है रामचरण की जीजी
हे रे गीत गार, निकली है भार, चलदी है जब घरकू ।
जामणो तेरस कू ।।
इस गीत में मीणाओं में प्रचलित जच्चा गायन और उस समय होने वाले क्रिया-कलाप का वर्णन उत्कृष्ट शैली में किया गया है । मीणाओं में परम्परागत रुप से स्त्रियों के जो नाम पाये जाते है यहां उनका बड़ी संजीदगी और अनुप्रास शैली में वर्णन उल्लेखीय है कवि ने इस गीत में उच्च कोटि के बिम्ब विधान को चित्रित किया हैं । मीणा लोक-संस्कृति की मुखर अभिव्यंजना और अभिव्यक्ति इस गीत की अपनी थाति है । इस अवसर पर स्त्रियों को घूगरी ( गैहूं के उबले दाने) खील, बतासे आदि प्रदान किये जाते है जिन पर कि यह गीत प्रकाश डाल रहा हैं ।
आज के बदलते परिवेश में इस विद्या में भी विभिन्न परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगे हैं । पूर्व में इसकी कथावस्तु मुख्यत: धार्मिक ही होती थी परन्तु अब कुछ लौकिक व समाज में हो रही आस-पास की घटनाओं पर भी इसमें रचना होने लगी हैं । इसमें विभिन्न नवीन धुनों, नवीन कथ्य,एवं विभिन्न विद्याओं के अंशो व धुनो से निर्मित मिश्रित धुनों का भी समावेश स्वीकार्य हो गया है ।
( मेरी पुस्तक मीना लोक साहित्य एवम संस्कृति से )
आज के बदलते परिवेश में इस विद्या में भी विभिन्न परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगे हैं । पूर्व में इसकी कथावस्तु मुख्यत: धार्मिक ही होती थी परन्तु अब कुछ लौकिक व समाज में हो रही आस-पास की घटनाओं पर भी इसमें रचना होने लगी हैं । इसमें विभिन्न नवीन धुनों, नवीन कथ्य,एवं विभिन्न विद्याओं के अंशो व धुनो से निर्मित मिश्रित धुनों का भी समावेश स्वीकार्य हो गया है ।
( मेरी पुस्तक मीना लोक साहित्य एवम संस्कृति से )
Wednesday, 29 June 2016
मीणा लोक-साहित्य
की लोकप्रिय विधा-मीणावाटी गीत
वृहद विस्तार क्षेत्र गायन की
स्वतंत्रता, लिंग-भेद का अभाव, प्राचीनता, सर्वत्र प्रचलन,
सार्वकालिक,प्रेमाभिव्यंजना के आधिक्य एवम् मीणाओं के
पर्याय आदि गुणों एवम् विशिष्टता के कारण आज मीणावाटी गीत लोकप्रियता की दृष्टि से
इस अंचल में प्रथम स्थान पर प्रतिष्ठित हो चुके हैं । इन गीतों में वय-संधि की उमंग और
उल्लास है तो प्रेमियों का प्रेमोच्छवास, बैलों के गले की
घंटी की मिठास है तो उन्मुक्त खेत-खलिहान का रुप
लावण्य, प्रेमियों की पुकार है तो विरहिणी कृषक बालाओं की विरह वेदना, अनमेल
विवाह की पीड़ा है तो दहेज का दंश, संयोग ओर वियोग
से आप्लावित यह मेघ अपनी फुहारें यत्र-तत्र मुक्त रुप
से छिड़क कर मन और मस्तिष्क को सुखद,शीतल एवम् अमृत
सादृश्य अनुभूति से द्रवित करता रहता हैं ।
ध्रुव
तारे की भॉति मीणा लोकसंगीत में र्शीषस्थ स्थान पर आलोकित इस विधा की उत्तपत्ति को
जानने की जिज्ञासा मेरे मन मस्तिष्क पर आना स्वाभाविक ही था । इस दिशा में मैंने
एक यायावर की भांति स्थान स्थान पर घूमकर प्रयास किये परन्तु लिखित साक्ष्यों के
अभाव में केवल जनश्रुतियाँ एवम् अनेक
ग्रामीणों की धारणाओं के आलोक में ही इसकी उत्पत्ति और विकास पर कुछ अनुमान लगाने
की स्थिति में पहुंचा जा सकता हैं ।
इस संबंध में टोडाभीम निवासी बोधराज का मानना है कि ये गीत मीणाओं
को ईश्वर ने प्रसन्न होकर दान में दिये थे इसीलिए शुरु शुरु में इनमें धार्मिक
प्रवृति वाले गीत गाये जाते थे । इसी क्रम में उकेरी निवासी विश्राम मीणा का
मन्तव्य कुछ इस प्रकार हैं -
'पहले जब हल चलाते समय कुछ थकान महसूस होती थी
एव बैलों को भी हांकने के लिए बार बार कुछ न कुछ बड़बड़ाना पड़ता था तो एक बार एक
हाड़ी ने जब कुछ बातों को गीत के लहजे में गुनगुनाया तो उसके बैल अनायास ही तेज
चलने लगे ओर उसे खुद भी थकान कम महसूस होने लगी। इसी तरह इन गीतों का चलन हो गया ।'
गंगापुर सिटी में मिले एक बुजुर्ग श्री रामधन
मीणा ने इस पर प्रकाश डालते हुए बताया कि-' पहले शादी भ्याव में बारात तीन-चार दिन तक ठहरई, तो बराती टैम पास करबा कू गीत गावा ।
वहाँ पै ही बैरबानी भी बरातीन सू छेड़छाड़ करबा इस्या गीत बणा बणार गावई जो मजाकी लहजा का हा ।'
कदम खंडी के मेले में मिले इन गीतों के बड़े शौकीन और गायक श्री राम प्रसाद
मीणा कहते हैं कि- ' पुराणे समय में सब लोग अनपढ़ हा, चिट्ठी पतरी लिखबो कोई जाणों कोन हो, तो वा टैम पै पत्नी या प्रेमिका अपणा
ह्रदय की बातन ने इन गीतन का जरिया सू ही बतावेई और उनको उत्तर भी इस्या गीतन सू
ही मिलजावो, जेई
सू ये गीत ज्यादा चलबा लगगा।' इसी
प्रकार सिकराय निवासी एक अध्यापक श्री रमेश चन्द मीणा इन्हें सम्मोहन गीत के रुप
में इनकी उत्पत्ति मानते हुए कहते है कि-' प्राचीन काल में प्रेमी व प्रेमिका इन गीतों को
गाकर एक दूसरे को सम्मोहित कर अपने प्यार का इजहार करते थे और अपने प्रेम को
इन्हीं के माध्यम से परवान चढ़ाते थे ।'
राजकीय महाविद्यालय गंगापुर सिटी में सेवारत संस्कृत के व्याख्याता श्री
रामकेस मीणा के शब्दों में ' मनुष्य सामाजिक समस्याओं, विचारो तथा भावनाओं का जहाँ सृष्टा है
वहाँ वह उनसे प्रभावित भी होता हैं, अत: इन गीतों के रुप में मानव मन की सहज व
अनुभूतिगम्य भावनाओं और कल्पनाओं का फूट पड़ना स्वाभाविक ही था ।'
उपर्युक्त मत-अभिमतों के आलोक में यह कहा जा सकता है
कि ये गीत मानव मन में उठने वाली उन्मुक्त हिलोरों, मनोरंजन की आकांक्षा, उत्सवों की अनिवार्यता तथ शारीरिक थकान
के ह्रास हेतु प्रचलन में आये । बाद में इनमें विविध विषयों का समावेश होता रहा
तथा अपनी गेयता के कारण जनमानस में रच बस गये ।
मीणावटी गीतों के तीन प्रकार प्रचलन में हैं ।
1. एक
आँट(अंतरा) वाले
2. दो
आँट (अंतरे) वाले
3. पचवारा
एक आंट के गीतों का पूर्व-प्रचलित रुप अब प्रचलन में नहीं
हैं तत्पश्चात् इसका संशोधित रुप अद्यतन
अस्तित्व में है । इनमें एक ही अंतरा प्रधान होता हे तथा अंतरे के प्रथम शब्द की
पुनरावृत्ति के साथ् ही इसका तोड़ होता है -
Ø
पूर्वप्रचलित
रुप -
मैं चाल्यो मेड़ा कू गहणों डूंडड़ी में दे चाल्यो ।- मैं चाल्यो ।।
काको छंडगो बड़
में काकी नीचा सू डकरावेरे । काको छडगो।।
इन गीतों में अधिकांशत: अश्लील गीतों की भरमार थी इसी कारण इनका अंत
निश्चित था परन्तु गायकों और लोक कवियों ने इसमें साधारण सा परिवर्तन कर इसकी भाषा
एवं विषय वस्तु को बदल कर एक नये रुप का प्रादुर्भाव किया जो आज लोकप्रियता के साथ
अस्तित्व में है ।
Ø नवीन रुप - शंकर बाजरा की बाल बराबर म्हारो परण्यो
।
जयपुर जातो तो आ जातो अजमेर गयो दीखै ।
इन गीतों को गाते समय दो या तीन बार दुहराते हुए गाते है । इन गीतों में
श्रंगार के दोनों पक्षों यथा संयोग और वियोग के विभिन्न रुप मिलते हैं । इसके साथ्
ही ये मुक्तक शैली के गीत होते हैं । इनकी विषय वस्तु दैनिक जीवन में घटित घटना
एवं प्रेमी-प्रेमिका
के हाव-भाव, चे-टाऐं आदि का वर्णन होता हैं । यहाँ
इसके वैविध्य के कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं -
मनौती
Ø तेरे धजा चढ़ाऊं महावीर
पति
म्हारो पास हो जाय तो ।
अनुमान
Ø मुकरी को ठण्डो डील
नड़ा
में न्हायाई दीखे रे ।
पश्चाताप
Ø सैंदा भायेला सू बिन्या मिली,
ले चाल्यो परण्यो ।
मुक्तक रचना होने के कारण इनमें विविध भावों का
प्रकाशन होता हैं। इन्हें एक के बाद एक लगातार गाया जाता है । ये आकार में छोटे
होते हुए भी उस भाव को दर्शाने में समर्थ होते हैं ।
दो आँट वाले गीत
इन्हें ऊंचे सुर में गाया जाता है तथा इसमें दो अंतरे होते हैं ।
लोकप्रियता की दृष्टि से इनका स्थान अद्धितीय हैं । इन्हें कई स्थानों पर दो बोला
के नाम से भी जाना जाता हैं । इनका प्रतिपाद्य मुख्य रुप से मुक्त विषय होते हैं
परन्तु इसमें धार्मिक कथानकों पर आधारित रचनाऐं भी मिलती है । इनमें श्रंगार के
दोनों ही पक्षों का निर्वाह भली- भांति हुआ हैं। परन्तु वियोग पक्ष के गीत अपना
प्रभाव त्वरित गति से डालते हैं । यहाँ दोनों पक्षों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं -
- वियोग श्रंगार -
Ø
पडबाड़ा
की नार कुआ पै एकली रोवे रे,
Ø बाबुल सू खै दीज्यों दुख तेरी लाडली पावे रे,
Ø कहां हेरुगी परण्या दो कोलेज दौसा में रे,
Ø म्हारो हंसतो फूल कुमलगो, म्हारी जीजी नाटगी
दीखे ।
यहाँ प्रथम गीत में एक नवयौवना जिसका पति पढ़ने बाहर गया हुआ हैं । वह विरह
वेदना में अत्यंत दुखी हो रही हैं । घर में अपनी विरह- वेदना को लज्जावश कह नहीं पाती । जब वह
पनघट पर पानी भरने जाती है तो एकान्त पाकर पति की याद में आंसू बहाने लगती हैं ।
द्धितीय गीत में जब विरह असह हो जाता
है तो पथिकों से अपने पिता के घर सन्देश भिजवाती है कि आपकी लाड़ली बेटी ससुराल
में बहुत दुखी है आकर मुझे ले जाऐं ।
तृतीय गीत में
जब पीहर पक्ष से कोई नहीं आता तो विरहणी स्वयं अपने पति से मिलने उसकी कालेज ही
जाने का निर्णय करती है परन्तु वह दुविधा में है कि वहां तो कई कालेज है मैं
उन्हें वहां कैसे ढूँढ पाऊंगी ।
इन गीतों में विरह की मार्मिक स्थिति का चित्रण किया गया हैं तथा विरहणी के
हाव-भाव
एवं मनोवृति का चरम उत्कर्ष इनमें दृष्टव्य हैं।
- संयोग श्रंगार -
Ø तेरे मारया मुकरी भाई की बरात छोड्यायो रे,
भाई की
बरात छोड्यायो ।
Ø भारी हद लागे रे पतली सी माथे झेड़ धरती रे,
माथे
झेड़ धरती ।
Ø तोनें ले जाऊं रे पतली सी डर घरकान को लागे, रे
डर
घरकान को लागे ।
Ø बैरी बामण होगा लागे दाड़ की पूजा, रे
लागे दाड़ की पूजा ।।
नायक व नायिका की सगाई पक्की हो चुकी है परन्तु अभी विवाह नहीं हुआ । नायक
ने सगाई से पूर्व नायिका को किसी उत्सव में देख लिया और मिलने की इच्छा अपनी चरम
सीमा पर पहुंच गई । नायक छुपते छुपाते नायिका के गांव के बाहर पनघट की पगडंडी पर
मिलने आ जाता है। नायिका पानी लेकर उधर से गुजरती है तो नायक को सामने देखकर ठिठक
जाती है । नायक कहता है कि हे प्रिय तुमसे मिलने के लिए तो मैं अपने भाई की बारात
को भी छोड़कर यहाँ आया हूँ । जब तुम सिर पर पानी की मटकी लेकर चलती हो तो तुम बहुत
ही सुन्दर लगती हो और तुम्हारी यही छवि मुझे तुमसे मिलने को मजबूर कर देती है । कई
बार सोचता हूँ कि अब तुम्हारे बिना जीना असहाय हो गया है, तुम्हें साथ ही ले चलूं परन्तु घरवालों
का डर इसमें अवरोध बन रहा हैं । अब तो ब्राहमण भी हमारे दुश्मन बन गये हैं जिन्होंने मुहूर्त के लिए यह कहकर मना कर दिया
कि इसमें दाल की पूजा लग रही हैं । इन गीतों में सूक्ष्म भावों की अभिव्यंजना व
नायक- नायिकाओं
की चेष्ठाओं का प्रतिफलन सहज व अकृतिम हैं । इनमें नायक- नायिकाओं के रोजमर्रा की जिंदगी से
जुड़े पहलू व उनके आस-पास के परिवेश, ग्राम संस्कृति व यहाँ की प्रथाओं के
अनेको उदाहरण भरे पड़े हैं । यथा -
Ø देख जवानी का झटका मटकी तीन सिर पै, रे
मटकी तीन सिर पै ।
Ø काम करुं चित वहां रे टिरोली का टैर पै कूदे, रे
टिरोली का टैर पै कूदे ।
Ø मेरे इसी जचे भाई जीजी होल्यु लारे बैग वाड़ा
कै, रे
होल्यु लारे बैग वाउ कै ।
Ø तेरो कांई बिगड़े लोहड़ी सी म्होंडो देख ले
बादे,
म्होंडो देख ले बादे ।
Ø हाथ दियो बस गई रे कांई बैल्यू बालमा तेरी, रे
कांई बैल्यू बालमा तेरी ।
इन गीतों में इस अंचल का बैविध्य और
वैशिश्ट्य यत्र-तत्र
बिखरा पड़ा हैं । एक ओर जहाँ पति-पत्नी की अठखेलियां है तो दूसरी ओर प्रेयसी की
मिलनेच्छा, सास-बहू के झगड़े, पति को उपालभ्य, ननद के शिकवे-शिकायत , धार्मिक कथानकों पर आधारित अनेकों
निश्छल भाव इन गीतों में गूंजते हैं । नवयुवतियां इन गीतो को विभिन्न उत्सव, समारोहों से लेकर खेत-खलिहान तक में मुक्त कंठ से गाती हुई
नजर आती हैं । दौसा व जयपुर के कुछ क्षेत्र में इन गीतों को ' पचवारया गीतों' के नाम से भी जाना जाता है,जिनमें धार्मिक कथानकों पर आधारित बहुत
अधिक गीत मिलते है ।
-ज्यानकीय रावण लेगो आवे कोड़ा सू,
जल की तीरयां तीरयां डोले लक्ष्मण राम जोड़ा सू ।
Ø सात जुगन को प्यासो पंछी ठाड्यो जल में,
तोने भगत बताउ रे नारद म्हारे लारे चाल बन में
Ø बन में जावे, क्यूं दुख पावे, होटो आ ज्यायगो,
सेवा मात-पिता की करलै यहाँ ही भगवान आज्यायगो।
Ø अमर गुफा का अमर पेड की बैढ्यो जड़ में,
सारी अमरकथा ने सुणगो सूवो बैठ बड़ में ।।
Ø कहां सू आयो कुण को जायो कुण सू वा अडै,
कुण ने तोड़यो रे धनु-ष आगी आंगड़ी तडै ,
Ø अलवर की सड़क्यां रे माथे रिपटण होरी सै,
कैंया आऊं रे भरथरी बाबा बिरखा जोर देरी सै,
Ø कड़डी छाती करके राणी आजा मज में,
आरो न्यूं चिमके हात्या में राजा मोरधज के,
Ø कोई दिन ईया ई मरैगो लक्षमण राम करता,
लक्ष्मण राम करता ।।
Ø डटजा डट जा म्हारा राजा,
राणी पींगला नटैं, रे राणी पींगला नटै ।
Ø राणी तारावती बामण् के,
पाणी पीसणो करे।
राजा तो हरिचन्द पाणी भंगी के भरे,
इन गीतों की धुन बड़ी ही लुभावनी होती
हैं । ज्ञान विषयक गीतों को ग्रामीण जन रात्रि के समय अधाणे ( अलाव) पर
बैठकर बड़े ही चाव से सुनते और गाते हैं । कभी-कभी इन गीतों के गवैयो को भी बाहर से
बुलाकर विभिन्न आयोजनों पर इनका गायन सुना जाता है । इन गीतों में ओज व माधुर्य का
सुन्दर सांमजस्य देखने को मिलता है साथ् ही शांत रस का परिपाक इन गीतों में बड़े
ही सहज ढ़ंग से होता हैं ।पचवारा गीतों के प्रसिद्ध गायक श्री प्रताप मीणा, कैलाश
ड्राईवर एवम विष्णु मीना प्रमुख हैं ।इस अंचल में इन्हैं लोग आजकल सीडी के माध्यम
से भी बहुतायत से सुनते हुए दिखाई देते
हैं ।
मीणावाटी गीतो का प्रसार क्षेत्र
सम्पूर्ण दौसा, सवाईमाधोपुर, जयपुर,अलवर,करौली,टोंक जिलों एवम् भरतपुर की बयाना, वैर एवम् नदबई तहसीलों में हैं । इनमें
इस अंचल की बोली का ठेट रुप दिखाई पड़ता हैं । भरतपुर, जिले में इनमें आंशिक ब्रज का, दौसा व जयपुर में ढूंढाड़ी का प्रभाव
भी परिलक्षित होता हैं । मीणा जाति में सभी जगह एक जैसे आचार-विचार, रीति-रिवाज एवं विहावोत्सव की समानता की वजह
से इनकी कथावस्तु भी सम्पूर्ण अंचल में एक जैसी ही मिलती हैं । सामाजिक दृष्टि से
भी इन गीतों का अन्यतम महत्व है । एक ओर सामाजिक परम्पराएं एवं संस्कार हैं तो
दूसरी ओर सामाजिक कुप्रथाएं जैसे अनमेल विवाह,बाल विवाह, बहु विवाह, अंधविश्वास, रुढि़यों का चित्रण इन गीतों की खास
विशेषता है । पहले हमारे समाज में अनमेल विवाह होते थे लेकिन आज इस सामाजिक अभिशाप
का विरोध आवश्यक है ।
यहां की बोली के ठेठ शब्दों का मुक्त प्रयोग इन गीतों की विशेषता है जिनमें
नवयौवना के लिए मुकरी या टन्न गिंदोड़ी शब्द प्रयुक्त हुआ है इसी प्रकार भायेला (प्रेमी), भायेली (प्रेमिका), परण्या (पति) आदि का प्रयोग किया हैं । विशेषण रुप
में लोहड़ी सी (कमसिन उम्र की नायिका), पतली सी (छरहरे बदन की नायिका) तथा जीजी (माँ) व काका (पिताजी) के लिए प्रयुक्त हुआ हैं ।
मीणावाटी लोकगीतो की उपर्युक्त दोनों श्रेणियों में आहलाद, सत्य भावना तथा श्रंगार के दौनों
पक्षों का सुंदर समन्वय हुआ है । आमतौर पर प्रयुक्त उपमानों में खिलने वाली
इंद्रधनुषी छटा भावुक ह्रदयों में थिरकन पैदा करती है । ये गीत पढ़ने के लिए नहीं
अपितु, सुनने
के लिए हैं । इनमें मुख से उत्पन्न होने वाली लहर ही मुख्य है जो सुनने वालें को
उन्मत्त बना देती हैं । मीणा जाति में कोई भी ऐसा सहद्धय नहीं होगा जिसने इन गीतों
पर कायिक अनुमान प्रगट नहीं किया होगा । यही इन गीतों की लोकप्रियता की कुंजी हैं
।
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